Sunday, September 26, 2010

कठिनाइयो से रीता जीवनमेरे लिए नहीं,नहीं, मेरे तूफानी मन को यह स्वीकार नहीं. मुझे तो चाहिए एक महान लक्ष्य और, उसके लिए उम्रभर संघर्षो का अटूट क्रमओ कला ! तू खोलमानवता की धरोहर, अपने अमूल्य कोषों के द्वार मेरे लिए खोल अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में अखिल विश्व को बाँध लूंगा में .आओ,हम बीहड़ और कठिन सुदूर यात्रा पर चलें आओ, क्योकि छिछला निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन जीवनहमें स्वीकार नहीं .हम उंघते, कलम घिसते हुए,उत्पीडन और लाचारी में नहीं जियेंगे हम - आकांशा, आक्रोश, आवेग और अभिमान में जियेंगे असली इंसान की तरह जियेंगे.- कार्ल मार्क्स...

Tuesday, August 24, 2010

आज नहीं,अपने वर्षों बाद शायद पा सकूँ वह विशेष संवेदना जिसमें उचित हूँ ।मुझे सोचता हुआ कोई इंसान ,मुझे प्यार करती हुई कोई स्त्री ,जब मुझे समझेंगे-ताना नहीं देँगे;जब मैं उन्हें नहीं-वे मुझे पाएँगे,तब मुझे जीवन मिलेगा....तब तक अपरिचित हूँ ।- कुँवर नारायण...

Friday, July 9, 2010

ज्वरग्रस्त कवि का प्रलाप

किसी गृहवधू द्वारा धूप में कुंए की मुंडेर पर विस्मृतकांसे के कलश जैसा मैं तप रहा हूँ, देवियह ज्वर जो किसी पंहसुल सा पंसलियों में फँसा है. स्फटिक के मनकों जैसी स्वेद बिन्दुओं सेभरी हैं पूरी देह.आँखों में रक्त और भ्रूमध्यक्रोध के त्रिशूल का चिन्ह. दादे के ज़माने की रजाई केसफ़ेद खोल जैसा पारदर्शी आकास.नीचे कुंए में जल परकिसी एकाकी कव्वे कीरात्रिकालीन उड़नसैर का बिम्बपड़ता हैं चन्द्रमा के ऊपर. ठहरों थोड़ी देर औरबैठे रहो, जल में झांकती अपनी श्याम मुखच्छवियाँऔर बात करों बंधुत्व से भरी मेरा क्या हैं?मैं तो मात्र ताप ही ताप हूँ.पारे से नाप सकती हो मुझेकिन्तु तुम आम्रतरू की छांहकठिन हैं नापना जिसकीशीतलता, बस अनुभव ही अनुभव हैं.तुम्हे तो होना थाअगस्त्य मुनि का कमण्डलु. तुम्हे सुनकर यों लगता हैंजैसे नहाकर आया हूँ होशंगाबाद कीनर्मदा में, ठेठ जेठ के अपरान्ह. चलो ठीक हैं, तुम्हारे पाँव व्याकुल हैं.जाओ,तिमिर...

Monday, June 21, 2010

इस उड़ान पर अब शर्निन्दा, मैं भी हूँ और तू भी है /आसमान से कटा परिंदा, मैं भी हूँ और तू भी है / छूट गयी रस्ते में जीने मरने की सारी रस्में/ अपने अपने हाल पे जिन्दा मैं भी हूँ और तू भी...

Friday, June 18, 2010

नए ज़माने की कजरी

इन दीदाहवाई घटाओं की कोई दरोगा रबड़ी क्यूँ नहीं घोंट देता? दिल निचोड़े देती हैं.हमारे सब यारों को रोजगार ने इधर उधर कर दिया जानो तकिये की रुई बखेर दी. वरुन हीरो बनने दुबैया उड़ गए और निखिल ने रेडियो पे गाने बजाने की लिए पुने की बस पकड़ी. दीपक मुनिराजू जंगली हिमाले पर जाने को सामान बांधे बैठे हैं. जर्मनी को शशांक का हवाई जहाज़ एक टांग पर खड़ा हैं. साँची की रवानगी दिल्ली की और हैं, इस दिल्ली पर बजर गिरें.ब्रिंदा रूठ गयी और बनारसी बाबू आरम्भ मुंह चढ़ाये चढ़ाये फिरते हैं. दीपक गर्ग अपने आईवरी टावर की किवारियां ओंट खुदा जाने कौन सी खिचड़ी पकाने में मशगूल हैं. रुचिरा ने ध्यान लगा कर जोगनियाँ का भेष ले लिया और बंगाली मोशाय अभिसेक हेरोइन ढूँढने को मारे मारे भटकते हैं.हाय! हमारी तो महफ़िल ही उजड़ गयी.अब किसके मुंह लगे और किससे तमाम रात बहस करें. किसके गले में बांह डाल कनबतियां करें और हँस हँस के लोट-पोट...

Monday, June 7, 2010

जग से नाता छूटल हो

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो चंदन काठ के बनल खटोलाता पर दुलहिन सूतल होउठो सखी री माँग संवारोदुलहा मो से रूठल होआये जम राजा पलंग चढ़ि बैठानैनन अंसुवा टूटल होचार जाने मिल खाट उठाइनचहुँ दिसि धूं धूं उठल होकहत कबीर सुनो भाई साधोजग से नाता छूटल...

Tuesday, May 25, 2010

An IDEA has Changed Many Lives

An IDEA has Changed Many Lives This was another scholarship distribution day was in Eklera. The third year and the children who have got the scholarship are quite grown up now and it was really amazing to see the shy and cool children talking very boldly and confidently. In India there is one Cellular company whose advertise says “an idea can change your Life” here to see the changes in Lives of around 60 children is really amazing that I can nt define in words. I along with Ravi and Vikalp went to Eklera on 2 April, Shakir, Hanif and one more Chap from Satwas also joined us from Khategaon and we reached to Eklera. The village was in full swing as there was a Cricket Competition going on, and it was the last and final day of the competition. Villagers were expecting local Member of...

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